गुसाईं घराने के श्यामरंग

गुसाईं घराने के श्यामरंग


      श्यामरंग “कुंवर श्याम घराना” यानि “गुसाईं घराना” के युवा गायक हैं| इस घराने के गायन की ख़ासियत है इसकी बंदिशे| ठुमरी हो या हो खयाल श्यामरंग को गाने में परहेज नहीं| प्रस्तुत है ओमप्रकाश द्वारा श्यामरंग से की गयी बातचीत| (इलाहाबाद २ फ़रवरी, १९९३)


प्र. : आप किस घराने से तालुक रखते हैं?
उ. : गुसाईं घराना, जिसे कुंवर श्याम घराना भी कहा जाता हैं|

प्र. : यह तो कोई मशहूर घराना तो है नहीं?
उ. : हमारे यहां तो सब फ़क़ीर लोग ही थे| सबने स्वान्त: सुखाय गाया है| उनके सामने ना तो घराने के प्रचार-प्रसार का सवाल था और ना ही विद्यार्थी संगठन का| उन्होंने मौज़ में आकर गाया और अपनी संपूर्ण साधना को प्रभु चरणों में समर्पित कर दिया| तो प्रचार-प्रसार कौन करेगा? इसीलिए यह घराना अप्रचारित ही रह गया|

प्र. : आप के घराने की गायन शैली विशेषता क्या है तथा किन किन रागों को आप के घराने में अधिक गाते हैं?
उ. : हमारे घराने की गायकी का वैशिष्ट्य है मेरुखंड, छूट तथा मीड़ का प्रयोग करने का एक विशिष्ट ढंग| इस घराने की मूल धाती है इसकी बंदिशें| मेरुखंड का प्रयोग हमारे यहाँ थोड़ा अधिक भावुक है| भावुकता में कभी-कभी संतुलन खो देने का ख़तरा बन जाता है| ऐसा इसलिए है की हमारी बंदिशे नृत्य शैली की है किंतु इसी भावुकता पर संतुलन कायम रखना ही हमारे घराने की कुशलता है| हमारे घराने में बड़ी से बड़ी छूटे सहज अप्रयास ले लेते हैं| इस ढंग की हमारी शिक्षा ही होती है| इसी प्रकार यहाँ मीड़ को छोड़ कर एक कदम भी नहीं चलते| वैसे तो हमारे कुंवर श्यामजी ने अधिकांश रचनाएं मल्हार तथा कान्हडा अंग के रागों में ही की है| यह शायद इसीलिए भी हो सकता है की उपरोक्त राग उनके मनपसंद रहे हो| कुंवर श्याम ने सैंकड़ो ध्रुपद तथा धमारों की भी रचना की है| वे विभिन्न प्रचलित रागों में हैं| जैसे बिहाग, यमन, बागेश्री, काफी, देस आदि| हमारे घराने में मंद्र साधना पर वहीँ तक जोर देते है जहाँ तक सहज हो| हमारे पूर्वजों का कहना है की अधिक मंद्र साधना करने से कंठ की, स्वाभाविकता तथा उसका माधुर्य दोनों चुकने लगता है| गुसाईं घराने के कुछ काम बहुत क्लिष्ट तथा चमत्कारिक है, जिसकी साधना स्वाभाविक कंठ से ही हो सकती है|

प्र. : आपके पिताजी बड़े संगीतज्ञ है, तो आप को बचपन से ही संगीत में रूचि रही या बाद में हो गई?
उ. : बचपन में मैं संगीत सुनता था, या कुछ गाता भी था, किंतु उसका दीवाना ना था| में शायद इसलिए भी संगीत का सम्मान करता था की वह मेरे पिताश्री का पेशा था| यद्यपि कंठ अच्छा होने की वजह से गाता था और लोग प्रशंसा करते थे, किंतु एक दिन पिताजी राग दरबारी का अभ्यास कर रहे थे, अचानक, मैं घायल सा हो गया. मैं मर्माहत हो दरबारी सुनने लगा, उसी दिन से राग दरबारी भी मेरे कंठ पर सवारी हो गयी धीरे धीरे अन्य रागों में भी मेरी रूचि हो गई|

प्र. : आप ठुमरी भी गाते हैं या केवल खयाल के गायक हैं?
उ. : गुसाईं परंपरा में ध्रुपद, खयाल, ठुमरी सब का गायन होता है| कुंवर श्यामजी की रचनाओं को सीधे सीधे गा लेने भर से ठुमरी के दर्शन हो जाते हैं| इसी भ्रम में आकर कुछ लोगों ने कुंवर श्याम का नाम ठुमरी के रचना कारों के साथ लिया है| जबकि कुंवर श्याम ने सैंकड़ो ध्रुपद भी रचे थे| स्वयं धाम बड़े भाव भरे कंठ से गाते थे उनकी रचनाएं विशुद्ध खयाल के तर्ज पर रची हुई हैं, किंतु उनकी क्षमता कुछ इस प्रकार की है कि वे ठुमरी में आसानी से खप जाती हैं| तो में ठुमरी गा सकता हूं, किंतु गाता नहीं क्योंकि वह एक अलग विद्या है और उप शास्त्रीय से मुझे परहेज है, किंतु खयाल गाना अच्छा लगता है|

प्र. : आप प्रतिदिन कितना समय अभ्यास के लिए निकाल पाते हैं? अभ्यास ना होने पर कैसा महसूस होता हैं?
उ. : प्रतिदिन तीन से चार घंटे का समय में अभ्यास के लिए निकलता हूँ| कभी किसी मजबूरी वश यदि अभ्यास नहीं हो पाया तो पूरा दिन ही बड़ा उदास-सा लगता है| कभी-कभी चिडचिडापन महसूस होने लगता है|

प्र. : संगीत के विकास में घरानों की क्या भूमिका हैं?
उ. : अनुशासन विकास की पहली सीडी है और अनुशासन हमें घरानों में ही सीखने को मिलता है| हमारे गुरु या उस्ताद जो कुछ भी कहते है, हम उसे वेदवाक्य मानकर चलते है| उसी लिंक पर चलते चलते घराने के सभी छोटे-मोटे रास्तों का पता हमे चल जाता है| हमारी गायकी का ढंग और अंग वैसा ही हो जाता है| बाकी तो गाना बजाना अपने मिज़ाज से होता है, अपनी तबियत से होता है| एक बार स्टैम्प लग जाता है ओह माल की कीमत बढ़ जाती है, भाव तो अपना अपना होता है, हर हालत में| किसी ख़ास शैली का या ढंग का अनुशासन में रहकर अभ्यास करने से उस शैली का विकास होता है| किसी शैली का विकास संगीत के विकास का ही एक अंग है|