गुसाईं घराने की रसयात्रा

गुसाईं घराने की रसयात्रा


डॉ श्यामरंग शुक्ला



      आज घरानों का अस्तित्व सिमटने लगा है| एक वर्ग नक़ल नहीं, सृजन के महत्व को स्वीकारता है, तथा बगावत के शब्दों में कह उठता है - घराना सिर्फ नाराबाजी है - तोताराम पन है| एक दूसरे वर्ग की आस्था है - इस घराने की अच्छी बातों का चयन करके एक नया संकलन तैयार करने में कोई हर्ज नहीं| किंतु गुसाईं परंपरा इन दोनों बातोंसे उदासीन रही है| इस परंपरा की घराने को लेकर ना कोई शिकवा-शिकायत रही है और ना कोई आस्था|घराने के प्रति उसका ना कोई मोह रहा और नहीं दुराग्रह| भक्ति-पूत ह्रदय से प्रभु के सन्मुख अपने भावों के उद्रेग को उड़ेलना, उसका गुणानुवाद करना अथवा उसको रिझाना इस परंपरा की अहंता रही है| जिनके श्री चरणों से गुसाईं परंपरा की धारा प्रवाहमान हुई है, उनका नाम था गोस्वामी श्रीलालजी महाराज ‘कुंवार श्याम’ वे कृष्णभक्त थे| उन्होंने राधागोविंद मंदिर से बाहर निकलकर कभी अपना गायन पेशही नहीं किया|

      कुंवर श्याम एक अप्रतिम सर्जक थे| उन्होंने ने सृजन किया नहीं, वरन् भावावेग में उनसे वह स्वत: हो गया| जो रचना प्रयत्नपूर्वक की जाती है और जो सहज हो जाती है, दोनों की सम्प्रेषणीयता में मूलभूत अंतर हो जाता है| अन्त:करण से जन्मी रचना में अन्तस में समा जाने की अचूक क्षमता होती है| ‘कुंवर श्याम’ की भव्य रचनाओं में यही प्राणत्व है| इन रचनाओं में प्रियतम के सन्मुख प्रणयनिवेदन की सिफियाना भावभूमि पर शब्द और स्वर एक दूसरे के होकर रह जाते हैं| कुंवर श्याम जी के सामने घराना कायम करने या शिष्य बनाने जैसा कोई प्रश्न कभी उठा ही नहीं| वे नाद और ब्रम्ह की एकतानता में ही आत्मविभोर रहे| कुंवर श्याम जी की मृत्यु सन १९१० में हुई|

      स्वामीजी की सेवा में गुट्टू और गोपाल नामक दो भाई रहते थे| दोनों जातीं के नाई थे| उनको स्वामीजीने गाना सिखाया| कुछ ही वर्षों में वे गायन की कला में निष्णांत हो गए तथा अपनी लोचदार, ले प्रधान एवं नृत्य-प्रधान गायकी के लिए जाने जा ने लगे| गुट्टू और गोपाल भी कीर्ति-लिप्सा व घरानेदारी के छल-प्रपंच से मुक्त रहे| उन्होंने संगीत का वरन स्वान्त:सुखाय किया| वह भले ही परान्त:सुखाय हो गया| गुट्टू गोपाल के शिष्य पं. मोहन मिश्र इलाहाबाद में बस गए थे| उनके पास गुसाईं घराने की सैंकड़ो बंदिशें थी| कुंवर श्यामजी के रचे लगभग पचास ध्रुपद उनके पास थे| इस परंपरा में गुनिगंधर्व पं. लक्ष्मनप्रसाद जयपुरवाले का अहम् योगदान है| घराने की गायकी के परिवर्धन संवर्धन से लेकर रचनाधर्मिता तक पंडितजी की रसयात्रा बहुत मधुर वह सरस रही| छोटी-छोटी तानों की मोती-लड़ी से सँवरकर बंदिश जब ले पालने झूलती, तो प्रतीत होता की रागिणी साक्षात गायिका बनकर मुखर रही है| पंडित जी की रची सैंकड़ो बंदिशे उपलब्ध हैं| गुनिगंधर्व संत ह्रदय थे| आपने संगीत और आध्यात्म पर विभिन्न पहलुओं से चिंतन किया था| आप मुंबई के माटुंगा स्थित बाबा भगवानदास आश्रम में राजनीती, प्रकाश-लिप्सा तथा अपनी अवकात से अनभिज्ञ सिर्फ गाते रहे| आपका निधन दिसम्बर १९७७ में हुआ| आप के शिष्य परिवार में पं. राजाराम शुक्ल, पं. मुरली मनोहर शुक्ल, पं. गोविंदप्रसाद जयपुरवाले (पुत्र), श्रीमती एनिमा रॉय, श्रीमती सुहासिनी मुलगांवकर, श्रीमती सुनंदा जोग, श्री. धर्माधिकारी, श्री. गिर्धरप्रसाद जयपुरवाले (पुत्र), श्री. भवदीप जयपुरवाले (पौत्र) आदि प्रमुख है|

      पं. लक्ष्मनप्रसाद जयपुरवाले के शिष्य पं. राजाराम शुक्ल की शिष्य परंपरा बहुत विशाल है| आपने कई सौं जिवंत बंदिशों की रचना की है| हजारों शिष्यों को मुक्त ह्रदय से विध्या दान किया है| आप के प्रमुख शिष्यों में पं. मुरली मनोहर शुक्ल, पं. कलिका महाराज, श्री. दिगंबर तिवाटणे, स्व. विश्वनाथ मोरे (म्यूजिक डायरेक्टर), श्री. रमेश कलगुटकर, श्री. प्रमोद चोक्सी, श्री. रमाशंकर त्रिपाठी, श्री. श्रीनिवास बाल, पं. त्रिवेनिप्रसाद त्रिपाठी, श्री. जी. जी. उपाध्ये, श्री. राजेंद्र झवेरी, श्रीमती कुंदा कुलकर्णी, श्रीमती जयश्री चौगुले, श्री. राजकुमार सिंह, श्री. राजेश मुले, श्रीमती दीपिका सोम, श्री. दयाल सिंह, श्री. मधुकर धुमाल, श्री. विजयसिंह (पटना), श्री. संजय शहा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं|

      पं. राजाराम शुक्ल के शिष्य पं. मुरली मनोहर शुक्ल ने भी सैंकड़ों बंदिशों की रचना की है| उनकी लिखी हुई ‘मनहर संगीत रचना’ तिन भागों में प्रकाशित है|

      अत गुसाईं परंपरा में अध्यात्मता के अतिरिक्त संगीत के साथ-साथ साहित्य-बोध भी प्रखर रहा है|