पंडितजी: व्यक्तिमत्व एवं संगीत

पंडितजी: व्यक्तिमत्व एवं संगीत


डॉ श्यामरंग शुक्ल



      ‘श्रोता के पहले में अपने बारे में सोचता हूँ| अपने गाने का पहला श्रोता में हुं| मेरी समझ में हर श्रोता मेरे जैसा संगीतकार है|’ ये वाक्य संगीत मनीषी गयानाचार्य पंडित राजाराम शुक्ल के है| यदि आप एक बार उनसे बातें करलो तो उन्हें भूलना कठिन हो जाएगा|

      लम्बा कद, हृष्ट-पुष्ट शारीर, प्रसन्न वादन पंडितजी भारतीय संस्कृतिके पोषक है| विगत ४० वर्षों से मुंबई महानगरी में बास और सादा भारतीय लिबास! एक महापुरुष के स्वाभाविक दर्शन होते है| आपका संगीत संगीत के लिए है|

      “हजारो साल नरगिस अपनी बेनुरी पर रोती है| बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दिदवर पैदा” जौनपुर, जी हाँ! वही जौनपुर, जिसने संगीत जगत को ख्याल दिया| जहाँ उसके जन्मदाता सुल्तान शर्की हुंए| अपने एक ऐतिहासिक गौरव के सिवा कुछ शेष बाकि नहीं रहा था| संगीत के कुछ कद्रदान अपने इतिहास की रक्षामात्र कर रहे थे| उन दिनों गायक होना प्रतिष्ठा के प्रतिकूल माना जाता था| इसी वातावरण के जौनपुर ज़िला के अंतर्गत पंडितजी का जन्मा सुरतानपुर नमक ग्राम में १ मई १९२५ को हुंआ| आज सुरतानपुर नाम सार्थक हुंआ|

      उर्दू और फारसी भाषा के विध्वान, श्रीमदभगवतगीता के मर्मज्ञ एवं कवित्व प्रतिभा से संपन्न पिताश्री श्री रामलखन शुक्ल ने अपने पुत्र के लिए मन ही मन लक्ष्य निर्धारित कर रखा था| इधर पुत्र संगीतज्ञ बनने की चाह पाल रहा था| पिताश्री संगीत प्रेमी अवश्य थे| फिर भी समय आने पर उन्हें यह अच्छा नहीं लगा की एक ब्राम्हण बालक गायन विध्या सीखे| बालक खोया खोया सा रहने लगा| सुरतानपुर की माटी ने अपना प्रभाव दिखाया| बालक राजाराम ने चुपचाप घर छोड़ दिया| जाए कहाँ? राजाराम ‘राजा राम’ की नगरी अयोध्या आ गए जहाँ त्रेता में लवकुश ने सर्व प्रथम शाश्त्रीय गायन के माध्यम से भगवन राम का गुणगान किया था| पंडित भगवत किशोर ‘व्याकुल’ अपने समय के कुशल गायक थे एवं हारमोनियम वादन में सिध्हस्त थे|बड़ी-बड़ी रियासतों के राजा-महाराजाओं ने बड़े-बड़े खिताबों से इन्हें अलंकृत किया था| ये यहीं विराजते थे| उन्होंने राजाराम को संगीत की शिक्षा देना प्रारंभ किया| बालक आज प्रसन्न था| थोड़े ही दिनों में अपनी प्रगति एवं प्रतिभा से व्यकुलजी को प्रभावित किया| उन्हें यह ज्ञात हो गया की बालक पिताजी की इच्छा के प्रतिकूल गायन विध्या सिख रहा है| व्याकुल्जी व्याकुल हो गए पिता के वात्सल्य को सुर में लाने के लिए| बालक को लेकर सुरतानपुर आये| इनका गायन कार्यक्रम ग्राम के श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करवाया| पिताश्री गायन से प्रभावित हुंए अवश्य लेकिन फिर वही बातें! अपने पुत्र को गायक के रूप में देखना उन्हें पसंद नहीं था| व्याकुलजी प्रयत्न करते रहे| अंत में व्यकुल्जी सफल हुंए| पिताश्री राजी हो गए| घर पर ही साधना शुरू हुंई| संगीत की तकनीक के रेशे-रेशे को आत्मसात करने में लग गए| इसी बिच आपका विवाह हुंआ| कालांतर में पुत्र- रत्ना प्राप्त हुंआ| पुनः एक महीने के अंतराल में पत्नी तथा पुत्र दोनों कलवित हो गे|

      पिताश्री चोट पर चोट खाते हुंए खिन्न तो थे ही उस पर पुत्र का परिवार के प्रति उदासीन भाव उनको और निराश कर रहा था| उन्होंने अपने दोनों बेटों को बुलाया और कहा, ‘तुम दोनों अब पाना अपना उत्तरदायित्व वहां करो’| पंडितजी कुछ बोलते उसके पहले अनुज बद्रीजी ने जवाब दिया, ‘भैया जिस साधना में लगे हैं वह महान है: एक तपस्या है| मै आपके साथ पारिवारिक दायित्व की गाड़ी खींचूंगा| उन्हें करने दीजिये संगीत की साधना’| पंडितजी का utsaah दुना हुंआ| थोड़े दिनों बाद इनका दूसरा विवाह संपन्न हुंआ| घर पर कुछ दिन तक रहने की औपचारिक बाध्यता को जैसे-तैसे पंदितजिने पूरा किया| पिताश्री की अनुमति से आप इलाहाबाद आ गए| वहाँ आपको पं. मोहन मिश्र के दर्शन हुंए| यह गायन चरण के द्वितीय चरण का श्रीगणेश था| मिश्रजी के साथ भारत के कोने-कोने में भ्रमण करने का तथा उच्च स्टार का गायन सुनाने का अवसर प्राप्त हुंआ| यह क्रम चलता रहा| बाद में सुरतानपुर से पाठ लेकर यदा-कदा सुर्तानपुर भी आते और रियाज़ जारी रखते|

      पंडितजी की संगीत साधना में पुन: विक्षेप आया| उत्तर प्रदेश के सिंगरामऊ के कुंवर श्रीपाल सिंहजी ने इनके गायन से प्रभावित होकर हरपाल सिंह कॉलेज में अध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया| वहाँ सुविधाए तो सभी उपलब्ध थी लेकिन कला के विकास के लिए ना स्थान उपयुक्त था नहीं वातावरण अनुकूल| संकोचवश दो साल की अवधि पंडितजी ने वहाँ गुजारी|

      संगीत के सुरों की चोट से विक्षिप्त होकर विशिष्ट ज्ञान के लिए बड़े ही अरमान के साथ मुंबई जैसी माया नगरी में ४०-४२ वर्ष पूर्व आ गए| अब सांगीतिक जीवन में एक नया मोड़ आया और उच्चटार स्टार की सांगीतिक साथना आरंभ हुंई एवं पंडितजी का मुंबई में आगमन सार्थक हुंआ| कुछ ही वर्षों में पंडितजी की ख्याति फेल गयी और मुंबई आकाशवाणी द्वारा इनका गायन प्रसारित होने लगा| लेकिन अपने अनोखे व्यक्तित्व के कारण ही ये ख्याति एवं प्रलोभन के वशीभूत नहीं हुंए| और इन सांसारिक दिखावे से उपरत हो गए|

      वस्तुतः जीवन की सार्थकता पंडितजी ने ही की है| दरअसल पांडित्य जैसे असाधारण गुण को इन्होंने ही चरितार्थ किया है| जैसा की महाभारत ने इसे स्पष्ट कर दिया है|


‘सर्वत्र सम्पदस्तस्य सन्तुष्टं यस्य मानसम् |
उपान्द गढ़ पादस्य ननु चर्मावृतेव भू: ||’

      संगीत एक पवित्र कला है; रस निर्माण इसका मौलिक उद्देश्य हैं| पंडितजी संगीत के इस पक्ष के प्रति सजग रहे हैं| आज भी अधिक समय साधना में व्यतीत करते हैं| वे जानतें हैं और मानते भी हैं:-

      ‘दर्द-सर के बास्ते संदल बड़ी अक्सीर है,
लेकिन इसका पिसना दर्द सर से कम नहीं’

      आपके एक शिष्य पटने के निकट फतुहा में निवास करते हैं| प्रतिभा संपन्न हैं| जीविकोपार्जन के लिए सरकारी सेवा में संलग्न ये युवा कलाकार समयाभाव एवं अर्थाभाव के कारण मुंबई जाकर गुरु चरणों में उपस्थित होने में असमर्थ रहा करते हैं| ऐसे अवसर पर पंडित जी स्वयं मुंबई से फतुहा जाने का कष्ट झेलते हैं| किसी गुरु का अपने शिष्य के प्रति ऐसा वात्सल्य! ऐसी करुणा!! इतनी उदारता!! आप धन्य हैं| आप आप ही हैं| वह शिष्य बड़भागी हैं|

      आपका व्यक्तिमत्व जितना गहरा है उसमें पिरोया संगीत उससे भी कहीं गहरा उतरता है| सुर लगने की सहजता, चैन एवं तन्मयता पर आपका पर्यवेक्षण, अनुभव और काबू की स्पष्ट चाप है| मींड और गमक से सजी मर्दानी आवाज़ में लंबी से लंबी छुट मोती की लड़ी सी सेट हो जाती है| आलाप के समय इतने भाव विभोर हो जाते हैं कि आँखें मुंड जाती है, डूबान में सुध-बुध खो-सा देते हैं| आप एक सफल रचना शिल्पी है| लगभग ४०० जिवंत बंदिशों को रचकर संगीत में एक विशिष्ट योगदान दिया है| बंदिशें शब्द-चयन, स्वर संयोजन एवं राग पुष्टि के दृष्टिकोण से बेजोड़ है|

      पंडित जी प्रबल चिंतन है की शब्द और स्वर दो शक्तियां हैं| इनमें टकराव होने से रस भंग होता है, जिससे प्रतिकूल परिणाम हाथ लगता है| कल्पना के कैनवास पर शब्द और सुरों से राग का चित्र एक कुशल चितेरे की भाँती खींचने में आपका कोई सानी नहीँ| जहाँ तक इनके गायन-घराने का सवाल है, सच तो यह है की, ये अपने आप में ही एक घराना है| गुनिगंधर्व पंडित लक्ष्मणप्रसादजी के शिष्य होने के नाते इनका घराना जयपुर तो बनता है पर उनकी गायकी के पास होकर भी पंडितजी अपनी अलग पहचान बनाते हैं| कुछ के विचार है की पंडितजी और अमिरखां साहब की गायकी में समानता है| दरअसल मेरुखंड शैली और छुट-अंग गुसाई सुरसरी के दो किनारे हैं| इसकी पहचान इस घराने की विलक्षण बंदिशें है, जिन पर मेरुखंड और छुट-अंग की स्पष्ट महोर है| उस्ताद आमिरखां साहब की गायकी भी मेरुखंड और छुट प्रधान है, दोनों घरानों में इस शैली के प्रयोग के अपने अपने कोण है| सिर्फ मींड़ की एक प्रक्रिया है जो उन्हें अलग कर देती है| आलाप के समय स्वरों की बढ़त में पुनरावृति पंडितजी के गायन में कभी नहीं दिखती जो सुरों के साथ इनकी गहराई का प्रतिक है| गायन में इनका भाव श्रेष्ठ हैं, अध्यात्म के भाव का यथेष्ट पुट है उसमें| आपके तानों में विडार अंग अतुलनीय है जो इन्हें बतौर विरासत अपने गुरुदेव गुनिगंधर्व पंडित लक्ष्मणप्रसादजी से हासिल हुंई|

      आपके प्रमुख शिष्यों में मुंबई के श्री. मुरली मनोहर शुक्ल, श्री. श्रीनिवास बाल, श्री. क्षीजी उपाध्ये, श्री. राजेंद्र झवेरी, पं. कालिका महाराज, श्रीमती कुंदा कुलकर्णी, श्रीमती जयश्री चौगुले, शीमती विनया आपटे, श्री श्यामरंग शुक्ल (पुत्र), श्री राजकुमार सिंह (राजू पंडित), श्री. संजय शाहा, स्व. श्री. विश्वनाथ मोरे (म्यूजिक डायरेक्टर), श्री. राजेंद्र मुले, श्री. प्रमोद चोक्सी, श्रीमती दीपिका सोम, श्री. दयाल सिंह, श्री. रमाशंकर त्रिपाठी, श्री. मधुकर धुमाल एवं श्री. विजय सिंह (पटना) के नाम उल्लेखनीय है|