जौनपुर की मिट्टी के संगीतकार

जौनपुर की मिट्टी के संगीतकार


डॉ. श्यामरंग शुक्ला



      जौनपुर संगीत का शहर है, जौनपुर ने संगीत को ख़याल की ज़ुबान, जौनपुरी जैसे रागों का तर्ज दिया, इसी जौनपुर में एक गांव है सुरतानपुर, जहाँ १ मई १९२५ को पंडित राजाराम शुक्ला का जन्मा हुआ| बचपन से राजाराम शुक्ला आयेदिन की बैठकों में संगीतकारों को सुना करते थे| रात में देर तक चैता, पिलु, खमाज और काफी की सुरलहरियों से महफ़िल सराबोर हो जाती, यंहीसे आपके के ह्रदय में संगीत आ अंकुर अंखुआने लगा था| मधुर कंठ से कोई धुन छेड़ देते तोह वाह वाह की धूम मच जाती| इसी बीच माँ गुज़र गई और महामारी की चपेट में एक के बाद एक तीन भाई काल कवलित हो गए| पिताजी यद्यपि संगीत के निष्णांत प्रेमी थे| किंतु समय की उस संधि तक गायक को आज जैसा दर्जा प्राप्त नहीं था| वे बेटो को गायक नहीं; वरन् पढ़ा लिखाकर कुछ अपने ढंग का बनाना चाहते थे और यह सिर्फ गाना सीखना चाहते थे| दोनों एकदूसरे की अंतर्व्यथा को पढ़ नहीं प रहे थे| बाप-बेटे का संबंध भी दरकने लगा| एक दिन आप घर छोड़ कर अयोध्या जा पहुंचे|

      पंडित भगवत किशोर व्याकुल उस समय हारमोनियम के हस्ताक्षर थे| उनकी बड़ी ख्याति फैली हुई थी| देस की रियासतों, राजा-महाराजओं ने उन्हें बड़े बड़े खिताब और तबके भेंट किये थे| उन्ही से आपकी संगीत सिक्षा आरंभ हुई| एक इन उन्हें इनकी पारिवारिक विसंगतियों की जानकारी हुई तो स्वयं लिवाकर गांव आये| गांव में रहकर श्रोताओं के बीच कार्यक्रमभी पेश किया| यद्यपि पिताजी उनकी कला से प्रभावित हुए बिना ना रहे फिरभी पुत्र के लिए अपने निर्णय को बदलना काबुल ना हुआ| बीच-बीच में व्याकुल जी मौका देख कर कहते रहे और वह नकारते रहे| अंततोगत्वा एक दिन बहुत उंच नीच दिखने पर वो मान ही गए|

      जौनपुर में एक छोटीसी रियासत सीगंरामऊं है| कुंवर श्रीपाल सिंह वहां के राजकुमार है| हर तीज-त्यौहार पर उनके यहां संगीतज्ञों का जमघट होता है| कुंवर साहब स्वयं अच्छा गाते थे| एक ऐसा ही अवसर था, जब पंडितजी के साथ उनके यहां पधारे, कुंवर श्रीपाल सिंह ने आपके गायन का चक्कर आनंद उठाया तथा अपने यहांरहने का आग्रह किया| दूसरे दिन से ही राजा हरपाल सिंह कॉलेज में आपकी नियुक्ति संगीत अध्यापक के रूप में हुई| यद्यपि वहां आपको अनेक सुविधाएँ मिली, किंतु मन नहीं लग रहा था| एकदिन उस नौकरी को भी सलाम कर चले आये|

      मुंबई में अपनेपन की तलाश, सुर की तलाश, ठौर की तलाश ऐसीही कई तलाशों में भटकते रहें| किंतु भटकाव का दौर अधिक दिनों तक नहीं चला| धीरे-धीरे प्रस्थापित होने लगे| आकाशवाणी मुंबई से भी आपके गायन का प्रसारण होने लगा| इन्ही दिनों आपकी मुलाकात पंडित लक्ष्मण प्रसाद जैपुर्वाले से हुई| पंडित लक्ष्मण प्रसादजी गुसाईं परंपरा के प्रतीनिधि थे| आप उन्हीं से संगीत की तालीम लेने लगे और आपने संगीत उन्हीं से सिखा| सुर लगने की सहजता, चयन एवं तन्मयता पर आप के अध्ययन, पर्यवेक्षण, अनुभव तथा काबू की स्पष्ट छाप है| मीड़ और गमक से सजी मर्दानी आवाज़ में लंबी से लंबी छूट मोती की लड़ी सी सेट हो जाती है| आलाप के समय इतने भावविभोर हो जाते हैं की आँख मूंद है लगभग ४०० जिवंत बंदिशों को रचकर हिंदुस्तानी संगीत में आपने एक विशिष्ट योगदान किया है| बंदिशे शब्दचयन, स्वर संयोजन तथा राग पुष्टि के दृष्टिकोंनसेय आप बेजोड़ है| आपके प्रमुख शिष्यों में पंडित मुरली मनोहर शुक्ल, श्री. कलिका महाराज, श्रीनिवास बाल, श्री. जी. जी. उपाध्येय, श्री. राजेंद्र ज़वेरी, श्रीमती कुंदा कुलकर्णी, श्रीमती जयश्री चौगुले, श्री. राजकुमार सिंह, श्री. प्रमोद चोक्सी, श्री. विजय सिंह (पटना), श्री रमाशंकर त्रिपाठी आदि के नाम उल्लेखनीय है| किंबहुना संगीत के इतिहास में जौनपुर की माटी का एक अपना अध्याय है और उसमे पंडित राजाराम शुक्ल का अपना एक महत्व है|