‘मनहर’ मेरी दृष्टि में...

‘मनहर’ मेरी दृष्टि में...



डॉ श्यामरंग शुक्ल (१९९२)



“सत्य का वह परमपूत स्पर्श
हमें मिल जाय क्षणभर -
और हम जीना नहीं चाहते |”

      शायद इसी सत्य की तलाश, कलाकार में पपीहे की स्वाति-बूंद के लिए प्यास की तरह समायी रहती है| जिसके लिए वह अपनी टेर में आत्मा को उडेल देता है| इस सनातन पीड़ा व व्यथा के स्वर में ही उसके आनंद की परिणति है| उसकी उस पि-कहाँ की कसक में उसके लिए बस आनंद-ही- आनंद है| दर्द की अनुभूति तो दूसरे लोग करते हैं| पं. मुरली मनोहर शुक्लजी का आनंद भी इसी कोटि का है| उनका मानना है की ‘स्वरों के साक्षात्कार से बढ़कर दुनिया की कोई उपाधि नहीं है’| उनके लिए संगीत ‘स्वान्त:सुखाय’ प्रथम, तदुपरांत ‘परांत सुखाय’ होता है| पंडितजी कहते हैं - ‘संगीत मेरे लिए आराधना की वास्तु नहीं है; अपितु आराध्य है’| मुली-सा- मनोहर कंठ तथा ह्रदय में पावन गंगोत्री की शुक्लता (स्वच्छता) आपके व्यक्तित्व की परिभाषा है| गायन में जहाँ भावो का उद्गम है, वहीँ संप्रेषणीयता तथा रसानुभूति का संगम भी है| व्यक्तित्व मानवीय मूल्यों से मंडित है तो गायन सांगीतिक मूल्यों से अभिषिक्त| व्यवहार में वही सच्चाई और सफाई है, जो स्वरों के लगाव में है|

      आज तो लोग थोडी-सी प्रसंशा पाकर ही अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं| उनकी मानसिकता बदलने लगती है| लेकिन पंडितजी इसके अपवाद हैं| वे अपने आप को आज भी विद्यार्थी मानते हैं| उनका कहना है की संगीत क्षेत्र में गुरु होने की सम्भावना कम ही रहती हैं| हम गुरु बन जाते है मन मर्ज़ी से| यह पूछने पर गुरु किसे मानना चाहिए? आपने दार्शनिक मुद्रा में कहा, ‘गुरु वह है जो कला और मूल्यों की दृष्टी से कभी भी लघु ना हो’| आप सदैव प्रसन्नचित रहते हैं और चेहरे पर मुस्कान थिरकती रहती है| इस पर एक लोक कथा का स्मरण बरबस हो आया| उत्तरी अमेरिका में एक पेड़ पाया जाता है| जिसका नाम पेसिकोइया है| वह संसार का सबसे ऊँचा और दीर्घायु वृक्ष है| एक बार पेसिकोइया ने आम के वृक्ष से कहा, ’में दुनियाँ का सबसे ऊँचा एवं दीर्घायु वृक्ष हूँ| किंतु तुम इतनी प्रसन्न और मैं इतना दु:खी क्यों रहता हूँ?’ आम के पेड़ ने कहा - ‘मैंने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं, अतः मुझे पता नहीं’| पेसिकोइया ने उधर गुजरते हुए पथिक से वही प्रश्न पूछा| पथिक ने कहा, ‘तुम इसलिए दु:खी हो की तुमने सदैव अपनी और देखा है| अपनी ऊँचाई को देखा है| आम का पेड़ सिर्फ दूसरों को देखता है’| शायद मुरली मनोहर शुक्ल के प्रसन्नचित रहने का यही रहस्य है| इन्होंने कभी भी अपनी ऊँचाई की ओर नहीं देखा| इतना ही नहीं अपने भुत की ओर भी कभी मुड़कर नहीं देखा है| भविष्य की ओर देखने की आदत नहीं है, अलबत्ता वर्तमान को बखूबी जीने के पक्षधर हैं| ना राजनीति से मतलब, ना निंदा-स्तुति से और ना ही अन्य बातों से जिनमें अन्य लोग उलझे रहते हैं| स्वभाव में एक सात्विक निश्चलता का दर्शन होता है| यही कारण है किसी के भी साथ घुल-मिल जाने में समय नहीं लगता|

      पं. मुरली मनोहर शुक्ल में रूप, गुण, विध्या-बुद्धि, कला-कौशल सब का सुघर संगम है| बहुमुखी प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि, हसमुख चेहरा, हाजिरजवाब पहले दर्जे के| आप के माहौल में हँसी-खुशी का फव्वारा हरदम छूटता रहता हैं| गौर वर्ण, सुन्दर शरीर, मझला कद, आँखों पर ऐनक, बँगला-कुर्ता पायजामा में रूप के साथ गुण, गुण के साथ शील, शील के साथ बुद्दि सब का सामंजस्य है| कविता लिखते हैं, गाते हैं, तबला बजाते हैं, हारमोनियम बजाते हैं, सितार बजाते या जिस भी वाध्य को थोडी देर छूने को मिल जाए, बजाने लगते हैं|

      ऐसे व्यक्तित्व के धनि पंडितजी की गायकी अपने-आप में निराली है| गुसाईं शैली का गायन, स्वर में सफाई, राग के चित्र में ऐसा-ऐसा रंग भरते हैं कि देखते ही बनता है| विद्युत गति से तानों के ऐसे-ऐसे सट्टे सहज निकल जाते हैं कि श्रोता वाह-वाह किये बिना रह नहीं सकता| गाने में ‘आह’ और ‘वाह’ दोनों का एक चरपरा मिक्सचर बड़ा लुभावना लगता है| बड़ी से बड़ी छूट लेते हैं, किंतु यह कभी नहीं देखा गया की उस के लिए भागीरथ प्रयत्न करना पड़ा है या हाथ-पैर- मुख-मुद्रा पर काबू छोड़ चुके है|

      आपकी रचनाओं में काव्य-शिल्प एवं संगीत-शिल्प दोनों का समन्वय है| मेरुखंड अलंकार बड़ा सुबद्ध और सटीक प्रयोग इन रचनाओं में स्फुट है| कई सौ बंदिशों की रचना आपने की है| ‘मनहर संगीत रचना’ के दो भाग प्रकाशित हो चुके है और तृतीय भाग संगीत रसिकों के सन्मुख प्रस्तुत है|

      गुरुवर्य पं. मुरली मनोहर शुक्ल की संपूर्ण साधना, समर्पित भावना तथा उनके संस्थारूपी व्यक्तिमत्व पर जितना भी लिखा जाय कम होगा|

      कामना है - पंडितजी शतायु हों|