गुसाईं कुंवरश्याम घराने की परंपरा परिचय

गुसाईं कुंवरश्याम घराने की परंपरा परिचय


डॉ. श्यामरंग शुक्ल



      जब गायक अपने समस्त भाव को प्रभु को समर्पित कर देता है, तो वही भक्ति हो जाती है| यही समर्पण का भाव ही भक्ति का मूलधन होता है| और जब उस भाव को स्वर मिल जाता हैं, तब किसी हरिदास का जन्मा होता है| यही भाव गुसाईं परंपरा के गायन का प्राण तत्व है| जो हमें स्वामी हरिदास से पारंपरिक आदर्श के रूप में प्राप्त है|

      श्याम-श्यामा जोड़ी की केलि का अवलोकन तथा भावावेश में उसका गायन ही स्वामीजी का आहार और उनके प्राणों का आधार था| वे उस केलि को केवल चुपचाप देखते ही नहीं थे, अपितु एक सहचरी के रूप में उसकी उलझनों को सुलझा कर विहार की निरंतरता को बनाये रखते थे|

      हमारी परंपरा के शलाका पुरुष गोस्वामी श्रीलालजी महाराज (कुंवरश्याम) की रचनाओं का भी यही प्रनात्व है| सखी भाव से प्रियतम श्याम के सन्मुख अपने भावो को उद्रेक को उड़ेलना कुंवारश्याम ने स्वामी हरिदास से ग्रहण किया था|

      रस-शिरोमणि स्वामी हरिदास ९५ वर्ष की अवस्था में ब्रम्हलीन हुए| उनकी मृत्यु के बाद हरिदास संप्रदाय में समाज की परंपरा विच्छिन्न हो गई| किंतु कहा जाता है, की वल्लभकुल संप्रदाय और राधावल्लभ संप्रदाय में समाज की परंपरा रही है| हमारे कुंवारश्याम इसी राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़े है| वे भगवान श्याम के इतने बड़े भक्त थे, की अपना अस्तित्व मिटाकर ‘कुंवरश्याम’ हो गए| उन्होनें राधागोविंद मंदिर से बहार निकल कर कभी अपना गायन पेश नहीं किया, जब चारों और घराना कायम करने और प्रकाशन आदि को लेकर होड़ लगी थी| उस समय ‘कुंवरश्याम’ अपने भावों के दीप जलाकर राधाश्याम की लीलाओं का गान कर रहे थे| इस से स्पष्ट है, की गुसाईं परंपरा का विकास आश्रम और मंदिरों में हुआ ना की राज दरबारों में| अतः स्वाभाविक है, की इस परंपरा में शृंगार रस की अपेक्षा भक्तिरस का प्रवाह धिक् रहा| शृंगार का जहाँ स्पर्श हुआ है, वह निश्चित रूप से श्यामा-श्याम की केलि के सन्दर्भ में ही है| कुंवरश्याम की रचनाओं का साहित्यिक मुल्यांकन किया जाये, तो बात और स्पष्ट हो जाएगीं, की इन राग-रचनाओं की भावभंगिमा और तेवर स्वामी हरिदाससे मिलती जुलती है| स्वामी हरिदास की परंपरा भले साधुओं में रही हो, किंतु गायन की परंपरा गोस्वामी श्रीलालजी महाराज और उनके शिष्य समुदाय में आज भी जीवित है| इस परंपरा में ‘कुंवरश्याम’ तक केवल स्वामी हरिदास और राधावल्लभ संप्रदाय की रचनाओं का ही गायन होता रहा है| कुंवरश्याम एक अप्रतिम सर्जक थे| और क्यों ना हो? जो भक्त होगा वह कवी और गायक भी होगा| इसका पुष्ट प्रभाव भक्ति आन्दोलन काल में मिलता है| मीरा भक्त थी, अतः गायिका भी थी| सूरदास, त्यागराज भक्त थे, तो गायक भी थे| कुंवरश्याम की इस परंपरा में ख्याल गायन का प्रवेश हुआ| इसके पहले कुंवरश्याम ध्रुपद घमार के गायक थे| यह अलग बात है, की लोगोंने बिना समझें-बूझे कुंवरश्याम के नाम पर ठुमरी रचनाकार की मोहर लगा दि| इस का जो करण है वह यह है, की इन रचनाओं की पहुँच या रिझाने की क्षमता ठेठ ग्रामीणों से लेकर अट्टालिकाओ में रहनेवाले नागरिकों तक सामान रूप से रही है| अतः इस रससिद्ध रचनाओं के साथ अटकले लगाने की पूरी गुंजाइश है| लेकिन सच यह है की, कुंवरश्याम ध्रुपद, घमार और ख्याल के रचनाकार थे| किंतु आज भी हम उनकी रचनाओं को ख्याल के रूप में गाते है| ठुमरी गायकों के द्वारा गए जाने से उन्हें परहेज़ नहीं था| जब की कतिपय ठुमरी के कलाकार इन रचनाओं को ठुमरी के रूप में गाते है|

      एक कथा प्रचार में है| बादशाह अकबर छद्मवेश में तानसेन के साथ संवत १६३० में वृंदावनआया था| वहां तानसेन ने जानें-अंजाने में जिस प्रकार गायन किया, उसका परिष्कार कर के शुद्ध रूप में गाने के लिए स्वमिश्री हरिदास को विवश होना पड़ा| स्वामी हरिदास ने ध्रुपद की शुद्ध शैली में शुद्ध मल्हार के पद ‘ऐसी ऋतू सदा सर्वदा जो रहे, बोलत मोरन’ (श्री केलिमाल पद सं. ८९) का गायन कर ग्रीष्म ऋतू में ही वर्षा ऋतू का वातावरण उपस्थित कर दिया| स्वामीजी के द्वारा आलापचारी करते ही घटा घुमड़ आयी, मोर बोलने लगे और वर्षा होने लगी| कहने का तात्पर्य यह की स्वामीजी का रससिद्ध राग मल्हार था|उनके रचे ध्रुपद मल्हार में बहुसंख्या में मिलते है| कुंवरश्याम का प्रिय राग भी मल्हार ही था| मल्हार में उन्होंने अधिकाँश बंदिशे बनाईं है| उनका वर्ण्य विषय हुबहू स्वामीजी का ही है| वही मोर का बोलना, पपीहे का शोर, मेघ का गर्जन, हरयाली अमराई का वर्णन आदि में यह कहने के लिए पर्याप्त समानता है, की कुंवरश्याम स्वामी हरिदास के पंथ के गायक थे| इस परंपरा में गोसावी किशोरीलाल और गोसावी पन्नालाल का भी नाम जुड़ा है|

      कुंवरश्याम के सामने घराना कायम करने या शिष्य मुड़ने जैसा प्रश्न कभी उठा नहीं| वे तो नादब्रम्ह की एकतानता में ही विभोर रहे| कुंवरश्याम की मृत्यु १९१० में हुई| कुंवरश्याम की सेवा में गुट्टूगोपाल, उनकी अंतिम सांसों तक रहे| स्वामीजी ने उनको गायन सिखाया| कुछ ही वर्षों में वे गायन कला में निष्णांत हो गए| अपने लोचदार लय, न्रित्यप्रधान गायकी एवं बंदिशों के लिए उन्होनें काफी ख्याति अर्जित की| यध्यपि गुट्टूगोपाल बाबा घराने के छल प्रपंच वह कीर्ति लिप्सा से मुक्त रहे| गुट्टूगोपाल के शिष्य पं. मोहन मिश्र इलाहबाद में बस गए थे| उनके पास कुंवरश्याम रचित ५० से भी अधिक ध्रुपद उपलब्ध थे| स्वर्गीय पं. चंद्रशेखर पंत एवं स्वर्गीय पं. भीष्मदेव वदी भी इसी परंपरा के गायक थे| इस परंपरा के सर्वाधिक प्रतिभाशाली गायक गुणीगंधर्व पं. लक्ष्मनप्रसाद जैपुरवाले थे| उन्होनें गायन शिक्षा की शुरुआत अपने पिताजी पं. बलदेवप्रसादजी से की| तदनंतर गुट्टूगोपाल से गायन सिखा| गुट्टूगोपाल की मृत्यु के बाद लालिप्रसाद एवं अपने श्वसुर पं. बद्रीप्रसाद से टप्पे की क्लिष्ट गायकी सीखी| पंडितजीने मोरादाबाद के पं. माधोप्रसाद, रामानंद एवं ब्रम्हचारीजी (जो स्वर्गीय पं. विष्णु दिगंबर के साथ थे) से भी बहुत कुछ सिखा| गुणग्राही तबियत के कलाकार पं. लक्ष्मणप्रसाद ने जयपुर के उस्ताद बैरामखां से भी तालीम ली| तात्पर्य यह है की, गुसाईं परंपरा की गायकी में गुणीगंधर्वने अन्य कई स्थानों से मधुसंचय कर के चार चाँद लगा दिया|

      अपने पुर्वजों के भांति पं. लक्ष्मणप्रसाद जयपुरवालेने आश्रम में ही संगीत का अलख जगाना पसंद किया| इसी प्रकार नेक शिष्यों ने विध्या ग्रहण की| किंतु इस घराने की मशाल लेकर आगे बढनेवालों में जिनका नाम अत है उनमें पंड़ितजी के ज्येष्ट शिष्य गयानाचार्य पं. राजाराम शुक्ल ‘ज्योतिरंग’, पं. मुरली मनोहर शुक्ल ‘मनहर’, स्वर्गीय पं. गोविंदप्रसाद जयपुरवाले तथा डॉ. ए. वी. शेनॉय का नाम प्रमुख है| पं. राजाराम शुक्ल का शिष्य परिवार विशाल है| आपके प्रमुख शिष्यों में सर्वश्री पं. मुरली मनोहर शुक्ल ‘मनहर’, पं. कलिका महाराज, पं. त्रिवेनिप्रसाद त्रिपाठी, श्री. दिगंबर तिवाटणे, स्वर्गीय सिने संगीत दिग्दर्शक श्री. विश्वनाथ मोरे, डॉ. श्यामरंग शुक्ल (सुपुत्र) के नाम गणमान्य है| पं. राजाराम शुक्ल ने सैकड़ो बंदिशों की रचना की है, जो शीघ्र प्रकाश्य है|

      जैसा की ऊपर कहा गया है, की इस मंदिर की परंपरा में हर गायक एक उमदा सर्जक रहा है| पं. मुरली मनोहर शुक्ल एक मंचस्थ गायक, श्रेष्ठ रचनाकार एवं उच्च कोटि के शिक्षक है| इनकी रचनाओं का संग्रह ‘मनहर संगीत रचना’ ३ भागों में प्रकाशित हुआ है| इनकी शिष्य परंपरा में श्री. तनूजा धारेश्वर (दिवगी), विख्यात पार्श्वगायक श्री. महेन्द्र कपूर उनके सुपुत्र रोहन कपूर को विशेष मार्गदर्शन कर रहे है| श्री. शैलेन्द्र भारती, शीमती शांता बेनेगल (अमेरिका), श्रीमती पूर्णिमा भट कुलकर्णी (पुणे), श्री. शेखर शिंदे, श्री. प्रभाकर सावंत, श्रीमती समिधा यार्दी, श्रीमती मीणा कुलकर्णी, श्रीमती उषा पटवर्धन, श्री. दत्ता जाधव, स्व. श्रीमती दमयंती प्रताप, डॉ. रविन्द्र डी. डी., श्री. साजिदार्जुन कर्मज्योति, श्रीमती जेसिका महादेवन, श्रीमती हेमलता नाडकर्णी, श्रीमती शोभा अगरवाल, श्री. नरेंद्र कोठंबिकर, श्री. मनमोहन सायगल, कु. कल्याणी हम्माडी, श्रीमती रुपाली दलाल, कु. संजुक्ता वाघ आदि के नाम उल्लेखनीय है|

      गुणीगन्धर्व पं. लक्ष्मणप्रसाद के ज्येष्ठ पुत्र पं. गोविंदप्रसाद असमय में काल कवलित हो गए| इस से गुसाईं परंपरा को अपूर्णीय क्षति पहुंची है| किंतु पं. गोविंदप्रसाद के सुपुत्र पं. भवदीप जयपुरवाले एक होनहार गायक है और संगीत क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे है| पं. के दुसरे सुपुत्र गिरिधरप्रसाद जयपुरवाले एक श्रेष्ठ तबला वादक है, तथा गायन, वादन एवं नृत्य की संगती में ख्याति प्राप्त है|