गुणीगंधर्व पं. लक्ष्मनप्रसाद

गुणीगंधर्व पं. लक्ष्मनप्रसाद


शब्दांकन - पं. मुरली मनोहर शुक्ल, ‘मनहर’ (१९५२)



      मारवाड़ प्रांत में जयपुर बीकानेर के हमारे पूर्वज चंद्र वरदायी वंश में अनेक कवि और विद्वान होते चले आयें| जिनका सम्मान राज घरानों एवं क्षत्रियों में आज भी है| परंतु समय के फेर से जब मान सम्मान में कमी हुई, तो हमारे कुछ विद्वान पंडितोंनें संगीत को अपनाया| इसी वंश के मेरे पूज्य पिता पं. बलदेव प्रसाद एक सीधे साधे संत प्रकृति के गायक और नृत्यकार थे| उस समय के सुप्रसिद्ध नृत्यकार श्री. विंदादिनजी महाराज, लखनऊ नृत्य के प्रकांड पंडित थे| और इन्हीं से पिताजींने नृत्य की शिक्षा प्राप्त की थी और उनका राजा महाराजओं के दरबार में अच्छा मान सम्मान होता था| आज तक उसकी कथ्थक घराने की प्रणाली चली आ रही है|

      उस ज़माने के संगीत के प्रकांड पंडित वेहेराम खाँ एक कुशल गायक समझे जाते थे| पिताजीनें इन के साथ काफी दिन रह कर उस गायकी को अपनाया| पिताजी प्राय: दरबारों ही में रहा करते थे| विशेष कर किसी एक स्थान पर नहीं ठहरा करते थे| और किसी प्रकारकी तृष्णा भी नहीं रखते थे| उन में बाह्य आडंबर बिलकुल नहीं था और वे उस से घृणा करते थे| उनकी एक मनोरंजक घटना लिखने योग्य है|

      उस समय में इंदौर दरबार में होलिकोत्सव धूमधाम से मनाया जाता था| और भारतवर्ष के दुर-दुर के गायक दरबार में अपना कला कौशल दिखाने के लिए जाते थे| सभी कलाकारों को दरबार की तरफ से काफी संतुष्ट भी किया जाता था|

      एक बार इसी उत्सव के समय पर पिताजी इंदौर दरबार में पहुँच गए| और इनकी सीधी साधी वेशभूषा को देखकर दरबारियों ने गायकों की लिस्ट में उन नाम लिखने से इनकार कर दिया| बहुत हुज्जत करने पर एक वृद्ध कलाकार को तरस आया की बिचारा बहुत ग़रीब है| इसे भी कुछ मिल जाएगा| यह सोच कर अन्दर जाने दिया| उस दरबार का यह दस्तूर था की जो भी गायक आते, उन्हें पहले अहलकार लोग सुनकर पसंद करते| और बाद में दरबार के सामने उपस्थित करते थे|

      पिताजी को उन्होंने मामूली सा आदमी समझ कर उनकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया| सब कलाकार अपनी कला प्रदर्शित कर चुके थे| तब एक आदमीने हँसी की तौर पर कहा की तुम भी अपना महल दिखावो, क्या बेचते हो? या भूल से इधर आ टपके| उस पर पिताजी नें कहा की भाई, यह संगीत अथाग सागर है| इस पर कोई गर्व नहीं कर सकता| मगर मैं तो आप के इस दरबार की प्रशंसा सुनकर आया हूँ| और जो कुछ टूटा फूटा मुझे याद है, जरुर सुनाऊंगा| यह कहकर उन्होंने अपना तानपुरा मिलाया और गाना शुरू कर दिया| उन्होनें काफी परिश्रम से अभ्यास किया था और आवाज़ में ईश्वरीय देन थी| गाना आरंभ होते ही दरबारी सकटेकी सी हालत में हो गये| और आपस में कानाफूसी करने लगे, ये मामला तो कुछ और ही हैं| घंटे भर में गाना समाप्त किया| दरबारी लोग जो मंत्रमुग्ध हुए बैठे थे, अब लगे क्षमा याचना करने| अंत में उनको सम्मानपूर्वक दरबार के दस्तूर के अनुसार महाराजा के सामने उपस्थित किया गया| और महाराज भी उनका गाना ध्यानपूर्वक सुनाने लगे| उन्होंने स्पष्ट शब्दोमे कह दिया की हमने इस अंग की गायकी आज पहली ही बार सुनी है| सब कलाकारों को बीड़ा करने के बाद पिताजी को उन्होंने अपने दरबार ही में रहने को मजबूर कर दिया| और पिताजी दस वर्ष तक इंदौर दरबार में रहे|

      उन्हें दरबार की तरफ से जो धन प्राप्त होता था| उस को वे तमाम कलाकारों को अपने घर बुलाकर उनके खान-पान में ही व्यय करते थे| ग़रीबों और अतिथि सत्कार का ध्यान भी वे काफी रखते थे| पिताजी को वृद्धावस्था के कारन दो पैसे की अफीम खाने की आदत थी| मगर उनको वहां की अफीम पसंद नहीं थी|

      एक दिन दरबार में महाराजा साहब आप का गाना सुनकर बहुत प्रसन्न हुए| और बोले की पंडितजी आज में गाने से बहुत खुस हूं|और चाहता हूँ इनाम में कुछ जागीर गांव दिए जाए| पिताजी ने जवाब दिया सरकार क्यों उलझन में डालते हैं? मुझे आपकी प्रसन्नता में ही सबकुछ मिल जाता है| इस पर महाराजा साहब बोले की, पंडितजी, आज तुम को अपने इनाम के बारे में कुछ तो कहना ही होगा| पिताजी बड़ी नम्रता से कहने लगे, की हुजूर, में रोज़ दो पैसे का अफीम खाने का आदि हूं| जो यहां पर अच्छी नहीं मिलती| और दूसरी जगह से मंगाना दरबार की तरफ से जुर्म है| इसलिए अगर आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरे लिए अच्छी अफीम लाने का प्रबंध किया जाय| इसपर दरबारी सहित महाराजा साहब खूब हँसें| महाराजा कहे की ऐश्वर्य में फसनेवाले कलाकार का पतन होता है| तुम तो त्यागी कलाकार हो|

      जब पिताजी दरबार के बाहर निकले तो राजमंत्रीने उनसे कहा की, पंडितजी तुम बहुत ही भोले हो| अपने लिए नहीं तो अपने बच्चों के लिए तो जागीर मांग लेनी चाहिये थी| ऐसा समय बार-बार नहीं आता| इस पर पिताजी बोले की मंत्रिसाहब मैं समझ रहा हूं| मगर बात तो यह है, पूत कपूत को धन क्यों सींचे, बच्चों के भाग्य में जो होना है, वो उनके कर्मानुसार अवश्य होगा|

      इस घटना के समय पर सारा परिवार रतलाम में था| और मेरा जन्मा इसी स्थान पर संवत १९७३ और सन १९१७ के पौष शुक्ल पक्ष में मंगलवार की पूर्णिमा को प्रातःकाल ५ बजे हुआ| रतलाम गुजरात प्रांत में है| जब में ६ महीने का था, तब बड़े भाई और माता सहित इंदौर दरबार में बुलाया गया|क्यों की पिताजी पर इंदौर के महाराज की बड़ी कृपा थी| जिस समय मेरी आयु १ वर्ष की और बड़े भाई पं. मूलचंदजी की आयु ११ वर्ष की थी| मेरी माताजी का अकस्मात स्वर्गवास हो गया| और पिताजी बिलकुल विरक्त रहने लगे| इंदौर के महाराजने पिताजी को दूसरी शादी के लिए बहुत कहा| लेकिन उन्होंने शादी करना इसलिए अस्वीकार किया की न जाने किस स्वभाव की स्त्री आ जाये| जिस से बच्चे और भी दुखी हो जाये| तब महाराज का दूसरा आदेश हुआ की इस छोटे बच्चे को हमारे निवास में रहने छोड़ दो| मगर पिताजी के ममता के कारण यह भी नहीं कर सके|

      लाड़-प्यार के कारण मेरे बड़े भाई ने संगीत में ज्यादा ध्यान नहीं दिया| लेकिन मुझे बचपन से ही संगीत का विचित्र शौक था| मेरी आयु जब ७ वर्ष की थी और पिताजी जब अपना अभ्यास करते थे, तब में भी उनके साथ ही आ आ करके उनके गाने की नक़ल करने का प्रयास करता था| एक झिंजोटी का प्रसिद्ध दादरा... झमाझम पानी भरे रे कौन... अलबेले की नार...| मैं अपनी तुतली ज़बान में अच्छे ढंग से प्रस्तुत कर सकता था| जिस कलाकार को मैं एक बार सुनता तो उनकी गायकी की छांप मेरे चित्त पर अंकित होती| और मैं उसकी नक़ल भी फिर अच्छे ढंग से करता था| इतनी छोटी अवस्था मैं मेरी लगन देखकर लोग बड़े प्रसन्न होते थे|

      दुर्भाग्यवश... तेरे मन कुछ और है... करता के मन कुछ और... अचानक पिताजी अस्वस्थ हुये| और महाराजा साहब से छुट्टी लेकर वे हम दोनों भाइयों को लेकर मारवाड़ पहुंचे| वहां हमारी वृद्धा नानिने पिताजी की अस्वस्थ अवस्था में बहुत देखभाल की| लेकिन... सुनहु भारत भावी प्रबल, बिलसी कहें मुनिनाथ... हानि लाभ जीवन मरण यश उपयश विधि हाथ| फिर पिताजी वापस इंदौर नहीं गए| सुजानगढ़ नामक एक ग्राम में उनका स्वर्गवास हो गया| उस समय में ६ वर्ष का था और भाई साहब १६ वर्ष के थे| अब हम दोनों भाई अनाथ हो गए| विद्या की कमी के कारण कोई ऊँचा स्थान हम लोगों को प्राप्त नहीं हुआ| इस कारण ८ साल तक अपने तमाम कुटुंबियों का मोह छोड़कर हम दोनों भाई सारे रासलीला, नाटक, क्लब, थिएटर, इत्यादि जगहों पर जीविका के लिए ख़ाक छानते रहे| मगर ईश्वरी कृपा से उस में भी सम्मान रहा| और में अपनी धुन में कुछ ना कुछ उन्नति करता रहा| उस ज़माने में श्रीकृष्ण संगीत थिएटर कंपनी ऑफ़ कानपूर का बड़ा नाम था| और उसमें आधुनिक संगीत के आलावा शास्त्रीय संगीत की भी चाय रहती थी| क्योंकि उस कंपनी में अछे संगीतज्ञ भी काम करते थे| अत: मुझे भी उन्हीं लोगों की संगीत से प्रतीत हुआ की शास्त्रीय संगीत ही बहुत उच्च संगीत है| इसके अतिरिक्त उस कंपनी के मालिक बाबू श्रीरामजी की यह भावना थी की ये बच्चे विवाह शादी करके अपने जीवन को बनायें|

      एक बार हमारी कंपनी कराची में गई| उस वक्त में मजनू के पार्ट में स्टेज पर आता था| मुझे उस पार्ट की ऐवज में अच्छे पारितोषिक मिले| मेरी आवाज लोकप्रिय साबित हुई| कंपनी से हम को माहवार रु.१५० मिलता था| हम लोगों के पास जब काफी पैसा हुआ तो हमारे कुटूंबियोने हमे आ घेरा| जयपुर के सुप्रसिद्ध कलाकार पं. बद्री प्रसादजी जो की जयपुर दरबार के रत्ना थे| उनकी दो लड़कियों से हम दोनों भाइयों की एक साथ जयपुर में ही शादी हुई| हमारे श्वसुर दोनों भाई सुप्रसिद्ध कलाकार थे| और हमारें ससुराल घरानेंमें भी अच्छे अच्छे गायकों का मान सम्मान हुआ| पं. बदिप्रसादजी और खेमचंद प्रकाशजी फिल्म म्यूजिक डायरेक्टर, अपनी कला में बड़े प्रसिद्ध हुए| जिनके प्रति आज भी लोगों में आदरभाव है|

      उस समय गोस्वामी श्री लालजी महाराज उपनाम कुंवर शामजी के तीन शिष्य पं. मोहनलाल, श्री. लाडली प्रसाद और पट्ट शिष्य बाबा गोपालजी बड़े अच्छे गायक थे| मेरा देहली में इन लोगों से संपर्क हुआ| और जिस चीज़ की मुझ में कमी थी, इन लोगों की वजह से काफी पूर्ति हुई| मेरा अभ्यास देहली में खूब हुआ|

      शनैः शनैः मेरा अभ्यास बढ़ता गया और मेरे प्रोग्राम देहली रेडियो से शुरू हुए| उसके बाद बड़े बड़े कांफ्रेंस में भी मुझे गाने का चान्स मिला| इस प्रकार मैंने १३ वर्ष देहली रेडियो पर गया| १९४६ में मुझे वहां म्यूजिक सुपरवाइजर का काम मिला| उस काम को मैंने तीन वर्ष तक किया| उस के बाद ही मैं अपने श्वसुर पं. खेमचंद प्रकाशजी के पास मुंबई चला आया| लेकिन मेरे यहाँ आने के छ: ही महीनों के बाद उनका स्वर्गवास हुआ| और मैं इस अनोखी नगरी में असहाय बन गया| आज में चार साल से यहाँ हूँ| और भगवान की कृपा से मुझे मुंबई की जनता ने शीघ्र ही अपना कला कौशल दिखने का मौका दिया| जिस कारण मुझे मुंबई के अधिकाँश संगीत प्रेमी जानने लगे| आज भी में मुंबई रेडियो से गता हूँ| लेकिन इतना सब करते हुए मुझे समाधान नहीं| क्यों की जिस कार्य के निमित्त मैं यहाँ आया, वह तो अभी हुआही नहीं| मैं चाहता हूँ कि मुझे ऐसा स्थान प्राप्त हो| जहाँ से में अपने संगीतसे जनता की सेवा और प्रचार करूँ| मैंने आज चार साल इसमे बिताये| मेरा विचार है की अपने गुरु परंपरा के अनुसार शिक्षा आज विद्यार्थियों को मिलनी चाहिये| श्री स्वामी हरिदास संगीत आश्रम की स्थापना के लिए मैं जनता से ही मदद चाहता हूँ| क्यों की उनकी मदद के बिना इस कार्य का होना असंभव है| इस कार्य करने के मेरे उद्देश इस प्रकार हैं: १. प्राचीन शास्त्रीय संगीत की खोज| २. श्री स्वामीजी के समय का साहित्य, संगीत, ध्रुपद-घमार और घवरू आदि गायकी का प्रचार में लाना| ३. भक्ति, करूँ, शांती, श्रुंगार, वीर, हास्य, रौद्र, बीभत्स, अद्भुत इन नव-रसों को रागानुसार खोजपूर्ण साहित्य द्वारा जनता के समक्ष लाना| ४. आधुनिक गायन शैली ख्याल ठुमरी टप्पा गज़ल भजन होरी चतरंग आदि को प्राचीन गायन शैली द्वारा अधिक महत्वपूर्ण बनाना| ५. सम, विषम, अतीत, अनाघात, आदि लयों का प्रयोग, साहित्य संगीत में छुट गमक, सपाट आदि तानों एवं मेरु खंड, विडार अंग के अलंकारों को प्रचार में लाना| ६. नृत्य वाध्य आदि विषयों पर उपरोक्त विधियों द्वारा संशोधित प्रयोग करके अधिक प्रभावित बनाना| ७. ऑर्केस्ट्रा आदि विषयों पर भी पूर्ण प्रकाश डालना| मुंबई में मुझें आशा हैं की संगीत प्रेमी मेरे इस कार्य में यथाशक्ति हाथ बटायेंगे| मुझे यहाँ लोग गुनिगंधर्व के नाम से ही जानते हैं| जो की मुझे हरवल्लभ कोंफेरेंस, जालंधर पंजाब, में एक महात्मा द्वारा दिया गया था|